बत्तख:- खाकी कैंपबैल फॉन और वाईट रन्नर, मलार्ड बत्तखों के प्रजनन द्वारा विकसित की गई नस्ल है।
खाकी कैंपबैल बत्तख़ के बारे में सामान्य जानकारी।
भारत में अभी के समय मे खाकी कैंपबैल बत्तख़ की इतनी मांग है कि इसे फार्मर पूरा करने में असमथ हो रहे है।
हैचरी में मुर्गीयों के मुकाबले खाकी कैंपबैल बत्तख़ की ज्यादा मांग है।
इसका एक बहुत बड़ा कारण है।
अंडा उत्पादन।
हाला की खाकी कैंपबैल दूसरे बत्तख़ के मुकाबले ज्यादा अंडे देती है।
मगर इस प्रजाति की इतनी मांग रहती है कि हैचरी वाले पूरा करने में असमर्थ हो जाते है।
इस लिये खाकी कैंपबैल की कीमत दूसरे बत्तख़ से ज्यादा करना पड़ता है।
1खाकी कैंपबैल बतख को हर फार्मर किउं पालना चाहता है?
इसकी खासियत के कारण।
खाकी कैंपबैल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह साल में 280 से 300 अंडे देती है।
और इसके अंडे दूसरे बत्तख़ के मुकाबले साइज में थोड़े बड़े होते है।
खाकी कैंपबैल बत्तख़ अंडे का भार 70 से 72 ग्राम होता है।
खाकी कैंपबैल के अंडे का रंग हल्के हरे और सफेद रंग के होते है।
इस से आप अंदाजा लगा सकते है कि खाकी कैंपबैल बत्तख़ पानी मे उगने वाली हर हरी घास, घोंगली, कीड़े, आदि को खा लेते है।
जिस से फार्मर का फ़ीड लागत में बहुत कमी आती है।
अच्छा आहार देने से खाकी कैंपबैल बत्तख़ 2 महीने में 1500 Gm से 1600 Gm के हो जाते है।
2खाकी कैंपबैल बत्तख़ की पहचान
पहचान:- खाकी कैंपबैल फॉन और वाईट रन्नर, मलार्ड बत्तखों के प्रजनन द्वारा विकसित की गई नस्ल है।
नर बत्तख की पहचान पीठ के निचले हिस्से का रंग भूरा, तांबा, पूंछ परिवर्तित होती,
चोंच हरे रंग की होती है।
पैर पंजे गहरे संतरी रंग की होती है।
गर्दन चमकीला और मादा से लंबा होता है।
पूछ ऊपर से सामने की तरफ घुमा होता है।
मादा बत्तख का सिर और गर्दन भूरे रंग की, खाकी रंग के पंख और भूरे रंग की टांगे और पंजे होते हैं।
नर बत्तख का भार 2 लिको से 2.200 तक होता है और मादा बत्तख का भार 1.800 किलो ग्राम से 2 किलो होता है।
3बत्तख़ में लगने वाली प्रमुख बीमारियां
डक वायरस हेपेटाइटिस ( Duck virus hepatitis )
ईस बीमारी को 1 दिन के बच्चे से 25 दिन के बच्चे में देखा जाता है।
यह एक संक्रमित बीमारी है। जो हर्पस नामक विषाणु से होते है।
लक्षण, बहुत तेज़ दस्त, सुस्त हो जाना, और आंतरिक रक्त खून का बहना होता है।
रीमेरेला एनाटिपेस्टिफ़ेर संक्रमण ( Riemerella anatipestifer infection )
इस विषाणु की चपेट में आने वाले बत्तख़ का वजन कम होने लगता है।
दस्त होना और कभी कभी बिट में रक्त भी जाता है। गर्दन और सिर को घूमने के लक्षण होते है।
डक पॉक्स ( Duck pox )
इस बीमारी के चपेट में आने वाले बत्तख़ की ग्रोथ धीमा होता है। डक पॉक्स दो प्रकार के होते है। सूखा पॉक्स और गिला पॉक्स।
एफ्लाटॉक्सिकोसिस ( Aflatoxicosis )
यह फंगस के कारण होता है। जिसका मुख्य कारण फीड में नमी जिनमें अल्फा टोक्सिन की मात्रा होती है। उस फीड को खाने से होती है। इसके लक्षण सुस्त रहना, ग्रोथ में कमी, अंडे उत्पादन में कमी होना शामिल है।
बतख प्लेग, डक वायरस एंटरटाइटिस ( Duck plague ,Duck Virus Enteritis )
यह एक संक्रमित बीमारी है। जो बहुत ही पर्भावशाली दुष्परिणाम होता है। यह छोटे और बड़े सभी बत्तखों होता है। लक्षण सुस्त, और दस्त पिले, हरे, रंग के होते है। पंख ढीला कर देना, आदि शामिल है।
एशेरिशिया कोलाइ द्वारा संक्रमण ( Colibacillosis )
यह एक आम देखे जाने वाली बीमारी है। इसका प्रमुख कारण ई-कोली होता है।
साल्मोनेला ( Salmonella )
इस बीमारी के चोइट में आने वाले बत्तख़ में लगड़ापन, एक तरफ अकेला रहना, आंखे बंद होना, पंख का ढीला होना, शामिल होता है।
4बत्तख़ के अंडे से चूज़े कितने दिन में निकलते है?
28 दिन बत्तख़ के अंडे को 37℃ तापमान में रखने से बच्चे अंडे से बाहर निकल जाते है।
5अंडे से चूज़े निकलने की विधि
अगर आप बत्तख़ को अंडे सेकने देते है।
तो ध्यान दें अंडे ज्यादा पुराने ना हो गर्मी के मौसम में बत्तख़ के अंडे 5 से 7 दिन में ही खराब हो जाते है। कोशिश करे अंडे को किसी ठंडे जगह में रखें।
चूज़े निकालने वाले अंडे को फ़्रिज में ना रखें अंडे को फ़्रिज में रखने से अंडे के अंदर का भ्रूण मर जाता है।

बत्तख को बैठने वाले जगह बना कर दें। जिसमें सुखी घास रखें। 28 दिन तक बत्तख़ अंडे सेकने से बच्चे अंडे से खुद ही बाहर निकल जाते है।

हैचिंग मशीन
मशीन से बच्चे निकलने के लिये मशीन के अंदर का तापमान 37.2℃ से 37.4℃ में रखें।
humidity
आर्द्रता ( humidity ) को 55% से 60% बीच मे रखना होता है।
पहले दिन से 26 दिन तक अंडे को हर चार घंटे में घूमना होता है। जिस से चूज़ा बाहरी सतह से नही चिपकता।

26 दिन के बाद आर्द्रता ( humidity ) को 5% बढ़ा सकते। जिस से अंडे का बाहरी सतह नरम हो जाता है और चूज़े आराम से अंडे को तोड़ कर बाहर निकल जाते है।
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